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म्यूचुअल फंड्स

म्यूचुअल फंड्स
ज्यादा जोखिम न लेने वाले निवेशक डेट म्यूचुअल फंड्स को निवेश के लिए चुन सकते हैं. इस स्कीम में उन निवेशकों को खास तौर पर निवेश करना चाहिए जो नौकरी के दौरान अच्छी रिटर्न दिलाने वाले स्कीम की तलाश कर रहे हैं. ऐसा करके वह रिटारमेंट के बाद भी कैश फ्लो बनाए रख सकते हैं. अगर आप म्यूचुअल फंड्स अपने लाइफ के टार्गेट को लेकर स्पष्ट है तो आपके लिए निवेश स्कीम चुनना काफी आसान है. ऐसे में आप उचित फैसला भी ले पाते हैं.

म्यूचुअल फंड्स को इन शेयरों से है लंबी अवधि में जोरदार कमाई की उम्मीद, क्या आपने भी कर रखा है निवेश

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तमाम एक्टिव फंड मैनेजेर अपने स्टॉक पोर्टफोलियो के मैनेजमेंट के लिए खरीदो और टिके रहो (buy and hold) की रणनीति अपनाते हैं। इसके लिए वो ऐसे स्टॉक चुनते हैं जो लॉन्ग टर्म में निवेशकों को अच्छा रिटर्न देने की संभावना रखते हैं। कभी-कभी इस तरह के स्टॉक एमएफ पोर्टफोलियो में सालों साल रहते हैं। मनीकंट्रोल यहां आपके लिए ऐसे स्टॉक्स की एक सूची लाया है जिनमें म्यूचुअल फंडों ने लंबी अवधि के नजरिए से निवेश कर रखा है। यहां हम सिर्फ ऐसी स्कीमों को अपने विश्लेषण में शामिल कर रहे हैं। जिनका औसत AUM 100 करोड़ रुपये है। ये आंकड़ें 31 अक्टूबर 2022 तक के हैं। (सोर्स ACE MF)

आइये इन शेयरों पर डालते हैं एक नजर

मैं म्यूचुअल फंड्स में सीधे निवेश कैसे कर सकता हूँ?

अगर आपका KYC पूरा हो चुका है तो आप म्यूचुअल फंड में सीधे ऑफलाइन या ऑनलाइन निवेश कर सकते हैं। अगर आप ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन करने में असहज महसूस करते हैं, तो आप नज़दीकी शाखा में जाकर फंड में निवेश कर सकते हैं।

ऑनलाइन म्यूचुअल फंड्स म्यूचुअल फंड की स्कीमों में सीधे निवेश करने का सबसे आसान तरीका है और आपको कमीशन भी नहीं देना पड़ता। आप फंड की वेबसाइट या उसके RTA की साइट या फिर फिनटेक प्लेटफॉर्म से ऑनलाइन निवेश कर सकते हैं। फंड की वेबसाइट पर सीधे निवेश करने पर आपको कई लॉगिन मैनेज करने पड़ते हैं।

डायरेक्ट प्लान में निवेश करने का मतलब है कि आप फिनांशियल प्लान बनाने, अपने गोल के लिए सबसे सही फंड्स को चुनने, अपने पोर्टफोलियो को नियमित तौर पर मैनेज करने और ज़रूरत पड़ने पर उसमें फेरबदल करने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। हर किसी को म्यूचुअल फंड में सही फंड चुनना और पोर्टफोलियो को मैनेज करना नहीं आता है। इसलिए डायरेक्ट प्लान उन निवेशकों के लिए है जो इसे आसानी से कर सकते हैं। अन्यथा, म्युचुअल फंड के बारे में कम जानकार लोगों को डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा निवेश करने की सलाह दी जाती है।

म्युचुअल फंड क्या है?

ज़्यादातर लोगों को म्यूच्यूअल फंड्स पेचीदे और डरावने लग सकते हैं| हम आपके लिए बिलकुल बुनियादी स्तर पर इसे सरल और स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे| दरअसल, बहुत सारे निवेशकों की धनराशि जमा होने पर ही म्यूच्यूअल फंड की सृष्टि होती है| इस फंड के प्रबंधन के लिए फंड प्रबंधक नियुक्त होते हैं|

ये एक ऐसा ट्रस्ट है जो बड़ी संख्या में ऐसे निवेशकों की धनराशि एकत्रित करता है, जिन निवेशकों का एक उभय म्यूचुअल फंड्स निष्ठ/एकसा उद्देश्य है| तत्पश्चात, विभिन्न विकल्पों जैसे इक्विटी, बांड, मुद्रा बाज़ार के साधनों, और/अथवा अन्य सिक्योरिटीज में ये राशि निवेश करती है| हर निवेशक इकाइओं का मालिक होता है जो फंड के मल्कियत के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं| इस सामूहिक निवेश से जो आमदनी /लाभ उत्पन्न होता है, उसे सही अनुपात में निवेशकों में वितरित कर दिया जाता है, स्कीम के ‘नेट एसेट वैल्यू’ या NAV की गणना के पश्चात कुछ व्यय उस राशि में से घटा भी लिए जाते हैं| सीधे शब्दों में गर कहें, एक आम आदमी के लिए म्यूच्यूअल फंड सबसे साध्य विकल्प है जो उसे विभिन्न प्रकार के, व्यावसायिक द्वारा प्रबंधित सिक्योरिटियों में निवेश करने का अवसर प्रदान करता है, और जिसकी लागत भी अपेक्षाकृत कम है|

Mutual Fund: इक्विटी या डेट म्यूचुअल फंड में क्या है अंतर? आपके लिए क्या है बेहतर?

Mutual Fund: इक्विटी या डेट म्यूचुअल फंड में क्या है अंतर? आपके लिए क्या है बेहतर?

अगर आप अपने लाइफ के टार्गेट को लेकर स्पष्ट है तो आपके लिए निवेश स्कीम चुनना काफी आसान है.

म्यूचुअल फंड्स एक तरह का फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट है. इसके जरिए स्टॉक, गवर्नमेंट और कार्पोरेट बॉन्ड, डेट इंस्ट्रूमेंट्स और गोल्ड स्कीम में निवेश किया जाता है. पूरी तैयारी के साथ म्यूचुअल फंड के जरिए निवेश किया जाए तो बेहतर रिजल्ट देखने को मिलते हैं. हालांकि ये जरूरी नहीं कि सभी प्रकार के म्यूचुअल फंड सभी निवेशकों के लिए बेहतर हों. ऐसे में म्यूचुअल फंड में इनवेस्टमेंट से पहले निवेशकों को उसके बारे में जरूरी जानकारी जुटा लेनी चाहिए. साथ ही निवेशकों को अपनी रिस्क लेने की क्षमता, जरूरतों, टार्गेट और स्कीम की टेन्योर समेत तमाम पहलुओं को समझ लेना जरूरी है.

इक्विटी म्यूचुअल फंड्स

इक्विटी म्यूचुअल फंड्स या ग्रोथ ओरिएंटेड फंड्स एक बेहद खास स्कीम है. इस स्कीम के तहत स्टॉक एक्सचेंज मार्केट में लिस्टेड विभिन्न कंपनियों के शेयर में निवेशक के एसेट्स को इनवेस्ट किया जाता है. ये स्कीम म्यूचुअल फंड्स निवेशकों को उनके पैसे अलग-अलग सेक्टर की कई कंपनियों के शेयर में निवेश का मौका देता है. यही स्ट्रेटेजी निवेशक को जोखिम से बचाता है और उसके कारोबार में बड़े पैमाने पर बढ़ोत्तरी करने में मददगार होता है.

मिसाल के तौर पर समझिए कि एक निवेशक अपना 1000 रुपये इक्विटी म्यूचुअल फंड के माध्यम से 50 कंपनियों में निवेश किया. जिन कंपनियों के शेयर में निवेशक के एसेट्स इनवेस्ट किए गए उन सभी में उसका अनुपातिक लिहाज से मालिकाना हक हो जाता है. और सभी कंपनियां उसके पोर्टफोलियो में शामिल भी हो जाती हैं. जिन कंपनियों के शेयर में निवेशक के एसेट्स लगे हैं. अगर उनमें से कुछ स्टॉक अच्छा परफार्म नहीं कर पाए तो बाकी बचे निवेशक के पोर्टफोलियो में शामिल बेहतर परफार्मेंश वाले स्टॉक बुरे प्रभाव को कम करने या उस प्रभाव की भरपाई करके इनवेस्टमेंट वैल्यू को बेहतर बनाने का काम करते हैं. ऐसे में निवेशक को डावर्सिफाई पोर्टफोलियो और रिस्क एडजस्टेड रिटर्न के फायदे मिलते हैं.

डेट म्यूचुअल फंड्स

इक्विटी फंड के मुकाबले डेट म्यूचुअल फंड ज्यादा सुरक्षित और स्थायी है. हालांकि लंबी अवधि के निवेश में ये इक्विटी फंड के मुकाबले कम रिटर्न देते हैं. लेकिन बैंक के सेविंग अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट, रिकरिंग डिपॉडिट, पोस्ट ऑफिस स्कीम पर मिलने वाले रिटर्न की म्यूचुअल फंड्स तुलना में डेट म्यूचुअल फंड के रिटर्न बेहतर होते हैं. इक्विटी फंड की तरह इनमें भी निवेशक के पास डावर्सिफाइड पोर्टफोलियो होता है. इसमें निवेशक का पैसा फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटी (fixed-income securities), मसलन कार्पोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds), गवर्नमेंट सिक्योरिटीज़ (Government Securities) और ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) में निवेश किया जाता है. इस पर मिलने वाले रिटर्न का अनुमान कुछ हद तक पहले से लगाया जा सकता है.

टैक्स के लिहाज से देखा जाए तो डेट स्कीम पर तीन साल के भीतर मिलने वाले गेन को शार्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) कहते हैं. तीन साल के बाद के प्रॉफिट को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन ( LTCG) कहते हैं, अगर आप डेट फंड की यूनिट्स को खरीदने के तीन साल के भीतर बेचते हैं, तो उस पर हासिल प्रॉफिट पर निवेशक के टैक्स स्लैब के आधार पर टैक्स देना पड़ता है. मिसाल के तौर पर अगर एक निवेशक की टैक्स के दायरे में आने वाली इनकम 6,00,000 रुपये है और उसका STCG 1,00,000 रुपये है तो उसे 7,00,000 रुपये पर टैक्स देना होगा. डेट म्यूचुअल फंड में तीन साल या उससे अधिक समय तक निवेश किया गया हो तो उस पर होने वाले कैपिटल गेन पर इंडेक्सेशन बेनिफिट के साथ 20% टैक्स लगता म्यूचुअल फंड्स है.

म्यूचुअल फंड्स में विलंब की कीमत/कम्पाउंडिंग (चक्रवृद्धि) का प्रभाव

जब आप लंबी अवधि के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो आपको मिलने वाली रिटर्न्स पर कम्पाउंडिंग (चक्रवृद्धि) प्रभाव होता है। हालांकि, अगर आप कुछ सालों बाद देर से निवेश करते हैं, तो आपको उसमें नुकसान होगा। कम्पाउंडिंग (चक्रवृद्धि) प्रभाव आपके द्वारा जमा की जाने वाली रकम और उस रकम के बीच अंतर को बढ़ा देगा जो आप जमा कर सकते थे, अगर आप कुछ साल पहले निवेश की शुरुआत करते। इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए mutualfundssahihai.com/hi/what-age-should-one-start-investing देखें।

कम्पाउंडिंग (चक्रवृद्धि) प्रभाव लंबी अवधि में अपना जादू दिखाता है क्योंकि आप जितने लंबे समय तक निवेश में बने रहेंगे, आपकी रकम को कम्पाउंडिंग (चक्रवृद्धि) के लिए उतना अधिक समय मिलेगा। पॉवर ऑफ़ कम्पाउंडिंग एक आवर्धक लेन्स की तरह होती है जिसकी आवर्धन शक्ति समय के साथ तेज़ी से बढ़ती है। अगर आप निवेश में देर करते हैं, भले ही SIP के माध्यम से या एकमुश्त, और एक बड़ी रकम निवेश करते हैं, तो आप फिर भी ऐसे किसी व्यक्ति के करीब नहीं पहुँच पाएंगे जिसने आपसे, मान लीजिए, पाँच साल पहले निवेश की शुरुआत की थी। SIP के मामले में, हो सकता है वह आपकी तुलना में आधी रकम निवेश कर रहा/रही हो लेकिन आपका निवेश फिर भी उससे पीछे रहेगा। एकमुश्त निवेश के साथ भी, कुछ साल की देरी का मतलब होगा कि आपकी जमा हुई रकम ऐसे किसी व्यक्ति की जमा रकम म्यूचुअल फंड्स से कम होगी जिसने आपसे कुछ साल पहले निवेश की शुरुआत की थी। यह आपके निवेश से जुड़े फैसले में देर करने के लिए चुकाई जाने वाली एक बड़ी कीमत है।

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